अपने अंदर ऐसे प्रेम बढ़ाओः श्री श्री रविशंकर

अधिकतर हमारे जीवन में, इच्छाएं हमें नष्ट कर देती हैं। मुल्ला नसरुद्दीन की एक कहानी है। वे घोड़े पर सवार थे और घोड़ा घेरे में चक्कर लगा रहा था, लोगों ने उनसे पुछा, "मुल्ला आप कहां जा रहे हैं?" मुल्ला ने कहा," मुझे नहीं मालूम, घोड़े से पूछो।" हम ठीक इसी परिस्थिति में हैं।

जैसे घोड़ा तुम्हे नियंत्रित कर रहा है, घोड़ा तुम्हारे नियंत्रण में नहीं हो। तुम में, जब भी चाहो घोड़े पर सवार और उससे उतरने की क्षमता होनी चाहिए, बजाय इसके कि उससे चिपके रहो या घोड़े को तुम्हें नीचे फेंक देने की अनुमति दे दो।

इच्छाएं बुरी नहीं हैं। भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, 'मैं वो इच्छाएं हूँ, जो धर्म की पुष्टि करती हैं।' इच्छाओं का दमन करने का प्रयत्न मत करो, विवेक (सत्य और असत्य के अंतर को जानने की शक्ति) को जगाओ। इच्छाओं की पकड़ ढ़ीली करने योग्य बनने के लिए तुम्हें एक निश्चित आचार - संहिता का अनुसरण करना होगा। ये वह खाद है जिससे प्रेम का गुलाब खिलेगा। वे हैं:


अहिंसा: अहिंसक बनो, न केवल कार्य में, बल्कि अपने हृदय में, अपनी वाणी में, अपने विचारों में। तुम कानून के डर से अहिंसक हो सकते हो। लेकिन जैसे ही तुम मन में बोले कि, 'मैं उन्हें मार डालूंगा, तब तुमने उनका गला घोंट ही दिया, समझो।

सत्य: सत्य का अनुसरण करो और वर्तमान क्षण में जियो, अस्तित्व सत्य है। इस वाक्यांश, 'सत्यवान बनो' का अर्थ केवल सत्य बोलना नहीं है, बल्कि अपने समग्र जीवन से सत्य को व्यक्त करना है। सत्यम ब्रुयात, सच बोलो, प्रियम ब्रुयात, सुखकर सत्य बोलो और सत्यम प्रियम हितम, लाभकारी सत्य बोलो। सत्यम माने इसी क्षण अस्तित्व, जैसे है, उसका अनुभव करो, लेकिन सच्चाई से।

यदि कोई नेत्रहीन है और तुम उससे कहो, "तुम अंधे आदमी हो, "तो तुम सच बोल रहे हो, लेकिन ये बात उसे चोट पहुंचा सकती है। और बोलो वह, जो उनके लिए अच्छा हो। यदि मरीज़ कुछ ज़्यादा ही बीमार है, तो डॉक्टर को उसके अच्छे के लिए उससे थोडा झूठ तो बोलना ही पड़ेगा। यदि वह कहे, "कल तुम मरने वाले हो", तो वह इसी क्षण मर जाएगा।

शौचा: (शुद्धता) अपने मन, वाणी और शरीर में शुद्धता रखो। वस्तुओं की मिलावट-रहितता� शुद्धता है। जब एक पदार्थ से दूसरा पदार्थ मिलाया जाता है, जो समान गुणवत्ता या समान श्रेणी का नहीं है, तो हम उसे अशुद्ध कहते हैं। अगर कुछ चावल गेंहू, साबुन पाउडर और बालू से मिला दिए जाएं, तो वह मिलावट अशुद्ध है। लेकिन वही चीजें तुम्हारे सामने विभिन्न प्यालों में प्रस्तुत की जाए, तो तुम कहोगे, ये शुद्ध बालू, शुद्ध साबुन पाउडर, शुद्ध चावल और शुद्ध गेहूं है।

साक्षी के प्रति साक्षी बनकर अवलोकन करना शौच है। ये तब होता है, जब तुम्हारा अपना मन उसी की अपनी क्रियाओं का साक्षी बन जाता है और अपनी इन्द्रियों के बीच रिक्तता पाता है और बाहरी पदार्थों से उसे मिलाता नहीं। इसीलिए जब ध्यान में तुम गहरे उतरते हो, तब तुम अपने आप को बहुत शुद्ध अनुभव करते हो, क्योंकि तब चेतना सम्पूर्ण और समग्र गोचर होती है।

दया: तुम में क्रोध कब प्रज्वलित होता है, जब लोग किसी ऐसी प्रवृत्ति में लगे होते हैं या एक खास रूप से पेश आते हैं, जो तुम्हें पसंद नहीं। बस एक पल के लिए, वे जैसे हैं वैसे ही उन के लिए करुणा रखो। फिर एक परिवर्तन घटता है, तुम विशाल बनते हो, तुम्हारी आत्मा विकसित होती है। वह खड़ी-खड़ी घटनाओं की, बर्तावों की तुच्छता पर हंसती है। अपने हृदय में करुणा के साथ तुम इन घटनाओं से अछूते हो जाते हो और माया को पारकर जाते हो।

आस्तिक्य: (श्रद्धा) श्रद्धा तर्क और विवाद से बढ़कर है। तुम जो भी सब करते हो उसके और अपने अनुभवों के लिए तर्क लगाते हो। तुम अपने अनुभवों को तर्क और विवाद से हथियाना चाहते हो। जब विवाद और तर्क विफल हो जाते हैं, तुम कांपने लगते हो। वास्तविकता तर्क से परे है, सत्य तर्क से परे है। तुम सत्य को तर्क से नहीं पकड़ पाओगे। अगर तुम अपना सारा जीवन और उसके अनुभवों को तर्क से समझ सको, तो तुमने जीवन को सम्पूर्णतया जिया या जाना ही नहीं है।

अपनी इच्छाओं से मुक्त हो जाओ, फिर तुम्हारे प्रेम और भक्ति खिलेंगे। हरेक कली चिटकने में अपना समय लेती है; कली को फूल बनने पर जोर मत डालो। उचित समय की प्रतीक्षा करो, अपने भीतर के सम्पूर्ण पुष्प के लिए। तुम इश्वर के अपने हो और तुम्हारे सारे सुख, चिंताओं और इच्छाओं की देख भाल होगी।

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